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Mahashivratri 2026: शिव और शक्ति के मिलन का महापर्व – व्रत कथा, महत्व, पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

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Mahashivratri 2026
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MahaShivratri 2026: भारत में मनाए जाने वाले प्रमुख धार्मिक पर्वों में से एक महाशिवरात्रि भी है। इस दिन श्रद्धालु भगवान शिव की भक्ति में लीन होकर व्रत रखते हैं और विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। अधिकतर लोग महाशिवरात्रि के व्रत के महत्व से परिचित हैं, लेकिन यह पर्व क्यों मनाया जाता है, इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को होती है।

भारत अपनी समृद्ध धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यहां विभिन्न धर्मों और मान्यताओं से जुड़े अनेक त्योहार उत्साहपूर्वक मनाए जाते हैं। कुछ पर्व विशेष समुदायों तक सीमित होते हैं, जबकि कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें पूरा देश मिलकर मनाता है। महाशिवरात्रि ऐसा ही एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो भगवान शिव को समर्पित है। देश के अलग-अलग हिस्सों में शिवजी को अनेक नामों और रूपों में पूजा जाता है।

महाशिवरात्रि पूरे भारत में बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि महाशिवरात्रि का वास्तविक महत्व क्या है? इस लेख में हम महाशिवरात्रि के इतिहास, उसके धार्मिक महत्व और पूजा-विधि से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे आपको इस पावन पर्व की गहराई को समझने में सहायता मिलेगी।

हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को शिवरात्रि मनाई जाती है। किंतु फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को विशेष रूप से महाशिवरात्रि कहा जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। इसलिए यह पर्व उनके दिव्य मिलन की स्मृति में मनाया जाता है। शिव भक्तों के लिए यह दिन अत्यंत पावन और विशेष महत्व रखता है।

भोलेनाथ के भक्त इस अवसर को गहरी आस्था और उल्लास के साथ मनाते हैं। श्रद्धालु मंदिरों में जाकर जलाभिषेक, बेलपत्र अर्पण और रात्रि जागरण करते हैं, ताकि वे अपने आराध्य देव की कृपा प्राप्त कर सकें। महाशिवरात्रि की तिथि अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार हर वर्ष बदलती रहती है। वर्ष 2026 में महाशिवरात्रि का पर्व 15 फरवरी को मनाया जाएगा।

Table of Contents

महाशिवरात्रि क्या है? – What is Maha Shivratri 2026

महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व है, जो भगवान शिव को समर्पित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को भगवान शिव ने सृष्टि के संरक्षण और संतुलन हेतु तांडव नृत्य किया था। इसी कारण यह तिथि विशेष बन गई और इसे महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाने लगा। ‘शिवरात्रि’ का शाब्दिक अर्थ है – शिव की रात्रि

शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक सोमवार भगवान शिव की उपासना के लिए श्रेष्ठ माना गया है। इसके अलावा हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि आती है, लेकिन फाल्गुन मास की चतुर्दशी को विशेष महत्व प्राप्त है, इसलिए इसे “महाशिवरात्रि” कहा जाता है।

देशभर में महाशिवरात्रि से जुड़ी अनेक धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। इस दिन भक्त भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और कई स्थानों पर रात्रि जागरण का आयोजन किया जाता है। शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, और कई प्रसिद्ध मंदिरों में लाखों की संख्या में भक्त दर्शन करने पहुंचते हैं।

महाशिवरात्रि के अवसर पर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में विशेष उत्सव का वातावरण रहता है। ये ज्योतिर्लिंग हैं:

  • सोमनाथ
  • मल्लिकार्जुन
  • महाकालेश्वर
  • ओंकारेश्वर
  • केदारनाथ
  • भीमाशंकर
  • काशी विश्वनाथ
  • त्र्यंबकेश्वर
  • वैद्यनाथ
  • नागेश्वर
  • रामेश्वरम्
  • घृष्णेश्वर
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इस पर्व को विशेष रूप से शैव संप्रदाय के अनुयायी अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाते हैं। यह उनके लिए सबसे बड़ा धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है।

इस दिन विश्वभर के शिवालयों में अज्ञान और अंधकार को दूर करने का संकल्प लिया जाता है। भक्त व्रत रखते हैं और शिवलिंग का अभिषेक दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से करते हैं। बेलपत्र, धतूरा और फल अर्पित कर भगवान शिव से सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

Mahashivratri 2026 – शुभ मुहूर्त व जानकारी

विषयविवरण
साल2026
महाशिवरात्रि 202615 फरवरी
दिनरविवार
तिथिमाघ (फाल्गुन) मास, कृष्ण पक्ष चतुर्दशी
किसकी पूजा की जाती हैमहादेव (भगवान शिव)
कहाँ मनाया जाता हैभारत एवं विश्वभर में
किसका त्योहार हैहिंदू धर्म
भगवान शिव का वाहननंदी
संबंधित पुराणशिवपुराण

महाशिवरात्रि श्रद्धा, तपस्या और आत्मचिंतन का पर्व है, जो भक्तों को आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मकता प्रदान करता है।

महाशिवरात्रि क्यों मनाई जाती है?

महाशिवरात्रि का पर्व फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है, और इसे मनाने के पीछे कई पौराणिक और आध्यात्मिक कारण छिपे हुए हैं, जिनमें सबसे प्रमुख कारण भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी पावन रात्रि को वैराग्य के प्रतीक भगवान शिव ने गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था और शक्ति स्वरूपा माता पार्वती के साथ उनका विवाह संपन्न हुआ था, जो यह दर्शाता है कि शिव और शक्ति का मिलन ही इस सृष्टि के संचालन का मूल आधार है।

इसके अलावा, एक और प्रचलित मान्यता यह भी है कि इसी दिन भगवान शिव ने सृष्टि के संरक्षण के लिए हलाहल विष का पान किया था, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए, इसलिए भक्त इस दिन उनकी विशेष पूजा करके उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि महाशिवरात्रि के दिन ही भगवान सदाशिव अपने निराकार रूप से साकार रूप ‘लिंग’ (शिवलिंग) के रूप में प्रकट हुए थे, जिसे ‘लिंगोद्भव’ कहा जाता है, इसलिए इस दिन शिवलिंग की पूजा का सर्वोच्च महत्व है।

महाशिवरात्रि व्रत कथा (शिकारी की कहानी)

शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता में वर्णित एक अत्यंत प्राचीन और पावन कथा के अनुसार, पुरातन काल में एक चित्रभानु नाम का क्रूर शिकारी हुआ करता था, जो अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए नियमित रूप से घने वनों में जाकर निर्दोष वन्य जीवों का शिकार किया करता था, और वह अपने कर्मों के प्रति इतना आसक्त था कि धर्म-कर्म और पूजा-पाठ से उसका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था।

एक दिन, महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर, जब वह शिकार की खोज में जंगल गया, तो दुर्भाग्यवश दिन भर भटकने के बावजूद उसे कोई भी शिकार प्राप्त नहीं हुआ, और भूख-प्यास से व्याकुल होकर वह सूर्यास्त होने पर एक सरोवर के किनारे स्थित बेल (बिल्व) के पेड़ पर चढ़ गया, ताकि रात के अंधेरे में वहां पानी पीने आने वाले किसी जानवर का शिकार कर सके।

संयोगवश उस बेल के पेड़ के ठीक नीचे, जिसे लताओं और सूखी पत्तियों ने ढक रखा था, एक शिवलिंग स्थापित था, जिसके बारे में उस शिकारी को रत्ती भर भी ज्ञान नहीं था, और वह अपने शिकार की प्रतीक्षा में पेड़ की शाखा पर बैठकर अनजाने में ही बेलपत्रों को तोड़-तोड़कर नीचे गिराता रहा, जो सीधे शिवलिंग पर अर्पित होते गए।

रात्रि के प्रथम प्रहर में, जब एक प्यासी हिरणी (मृगी) वहां पानी पीने आई और शिकारी ने उसे मारने के लिए अपना धनुष-बाण चढ़ाया, तो उस प्रक्रिया में अनजाने में ही कुछ बेलपत्र और उसकी पानी की कुप्पी से कुछ बूंदें नीचे शिवलिंग पर गिर गईं, जिससे प्रथम प्रहर की पूजा संपन्न हो गई; और जब हिरणी ने शिकारी को देखा, तो उसने कातर स्वर में प्रार्थना की कि वह गर्भिणी है और अपने बच्चे को जन्म देने के बाद वह स्वयं उसके पास लौट आएगी, जिस पर शिकारी ने दया करके उसे जाने दिया।

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कुछ समय पश्चात, रात्रि के दूसरे प्रहर में एक दूसरी हिरणी वहां आई, जो अपने साथी की खोज में व्याकुल थी, और जैसे ही शिकारी ने पुनः शिकार के लिए धनुष ताना, तो उसके हाथ के हिलने से फिर से बेलपत्र और जल की बूंदें शिवलिंग पर जा गिरीं, जिससे अनजाने में दूसरे प्रहर की पूजा भी संपन्न हो गई; उस हिरणी ने भी अपनी विरह व्यथा सुनाई और वचन दिया कि वह अपने स्वामी से मिलकर वापस आ जाएगी, जिस पर शिकारी का हृदय थोड़ा और पिघल गया और उसने उसे भी छोड़ दिया।

तीसरे प्रहर में, जब एक मृग अपने परिवार को खोजता हुआ वहां आया, तो शिकारी के धनुष चढ़ाने की क्रिया से पुनः वही संयोग दोहराया गया—बेलपत्र और जल शिवलिंग पर अर्पित हुए, जिससे तीसरे प्रहर की पूजा भी पूर्ण हो गई—और उस मृग ने भी अपने परिवार से मिलकर वापस आने की सत्य-प्रतिज्ञा की, जिसे सुनकर शिकारी ने, जो अब तक भूख-प्यास और जागरण के कारण शारीरिक और मानसिक रूप से शुद्ध हो चुका था, उसे भी जीवनदान दे दिया।

अंततः, रात्रि का चौथा प्रहर आया और वे तीनों हिरणियां अपने बच्चों और उस मृग के साथ अपने वचन के अनुसार शिकारी के सामने मृत्यु को गले लगाने के लिए उपस्थित हो गईं, जिसे देखकर शिकारी का हृदय करुणा और पश्चाताप से भर गया, और उसकी आंखों से जो आंसू बहे, उन्होंने शिवलिंग का अंतिम अभिषेक कर दिया, जिससे उसका अज्ञान पूरी तरह नष्ट हो गया और उसने हिंसा का मार्ग सदा के लिए त्याग दिया।

जब उस शिकारी की मृत्यु का समय आया और यमराज के दूत उसे नरक ले जाने के लिए आए, तो भगवान शिव के गणों ने उन्हें यह कहकर रोक दिया कि महाशिवरात्रि के दिन निराहार रहकर, रात्रि जागरण करके और शिवलिंग पर बेलपत्र व जल अर्पित करके (चाहे वह अनजाने में ही क्यों न हुआ हो), इस शिकारी ने महान पुण्य अर्जित कर लिया है, इसलिए अब यह शिवलोक का अधिकारी है।

इस प्रकार, अनजाने में की गई महाशिवरात्रि की पूजा ने एक हिंसक शिकारी को भी मोक्ष का पात्र बना दिया, जिससे यह सिद्ध होता है कि जो भी भक्त श्रद्धा-भाव से इस दिन महादेव की आराधना करता है, उसके समस्त पाप भस्म हो जाते हैं और उसे भगवान शिव की परम कृपा प्राप्त होती है।

महाशिवरात्रि पर आधारित कथाएं

1. समुद्र मंथन और नीलकंठ की कथा (सृष्टि रक्षक महादेव)

श्रीमद्भागवत पुराण और महाभारत में वर्णित एक अत्यंत प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब प्राचीन काल में देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्ति की तीव्र लालसा से क्षीरसागर में मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नाग को नेती (रस्सी) बनाकर समुद्र मंथन आरंभ किया था, तो उस मथने की प्रचंड प्रक्रिया से अमृत निकलने से पूर्व सबसे पहले ‘कालकूट’ (हलाहल) नामक एक ऐसा अत्यंत भयंकर और विनाशकारी विष उत्पन्न हुआ, जिसकी तीव्र ज्वाला और उग्र प्रभाव से संपूर्ण ब्रह्मांड, तीनों लोक और यहाँ तक कि स्वयं देवता और असुर भी जलकर भस्म होने के कगार पर पहुँच गए थे।

उस महाविनाशकारी संकट की घड़ी में, जब कोई भी देवता या असुर उस हलाहल विष का सामना करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था, तब सृष्टि की रक्षा के परम उद्देश्य से सभी ने मिलकर देवाधिदेव महादेव की शरण ली और उनसे त्राहिमाम करते हुए प्राणों की रक्षा की गुहार लगाई, जिसे सुनकर परम दयालु भगवान शिव ने बिना एक पल का भी विलंब किए उस भयंकर विष को अपनी अंजुलि में भरकर पी लिया; परंतु उस विष के घातक प्रभाव को अपने शरीर में फैलने से रोकने के लिए उन्होंने अपनी योगमाया और ईश्वरीय शक्ति से उसे अपने कंठ (गले) में ही रोक लिया, जिसके कारण उनका गला हमेशा के लिए नीला पड़ गया और वे तीनों लोकों में ‘नीलकंठ’ के नाम से पूजनीय हुए।

यह पूर्ण मान्यता है कि जिस महान रात्रि को उन्होंने इस विष का पान करके संपूर्ण सृष्टि को मृत्यु के मुख से बचाया था, वही पावन रात्रि महाशिवरात्रि के रूप में मनाई जाती है।

2. लिंगोद्भव कथा: ब्रह्मा और विष्णु के अहंकार का नाश

शिव पुराण की एक अन्य अत्यंत गूढ़ और दार्शनिक कथा के अनुसार, एक बार सृष्टि के आरंभ काल में भगवान ब्रह्मा (जो स्वयं को सृष्टिकर्ता मानते थे) और भगवान विष्णु (जो स्वयं को पालनहार मानते थे) के मध्य इस बात को लेकर एक अत्यंत भीषण और अहंकारपूर्ण विवाद उत्पन्न हो गया कि उन दोनों में से कौन अधिक श्रेष्ठ, शक्तिशाली और परब्रह्म के अधिक निकट है, और जब यह विवाद युद्ध का रूप लेने लगा जिससे संपूर्ण ब्रह्मांड की शांति भंग होने का खतरा मंडराने लगा, तब उनके इस अज्ञान और अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान सदाशिव ने उन दोनों के ठीक मध्य में एक अत्यंत विशाल, तेजोमय और अनंत अग्नि स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) के रूप में स्वयं को प्रकट कर लिया, जिसका न तो कोई आदि (शुरुआत) दिखाई दे रहा था और न ही कोई अंत।

उस अनंत ज्योतिर्लिंग के रहस्य को सुलझाने और उसका छोर खोजने के लिए ब्रह्मा जी हंस का रूप धारण करके ऊपर की ओर आकाश की अनंत ऊंचाइयों में उड़ चले और विष्णु जी वराह (सूअर) का रूप धारण करके पाताल लोक की गहराइयों में नीचे की ओर उतर गए, परंतु हजारों वर्षों के अथक प्रयास और घोर परिश्रम के बावजूद दोनों में से कोई भी उस अग्नि स्तंभ का आरंभ या अंत नहीं खोज सका।

अंततः, जब दोनों देव अपने अहंकार को पूर्णतः त्यागकर अपनी हार स्वीकार करते हुए वापस लौटे, तब भगवान शिव उस अग्नि स्तंभ से अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए और उन्हें यह ज्ञान दिया कि वे तीनों ही एक ही परम सत्ता के भिन्न-भिन्न रूप हैं; और ऐसा माना जाता है कि जिस महान रात्रि को भगवान शिव पहली बार उस निराकार लिंग के रूप में प्रकट हुए थे, वही फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात आगे चलकर महाशिवरात्रि कहलाई।

3. शिव और माता पार्वती का दिव्य व अलौकिक विवाह

यद्यपि भगवान शिव मूल रूप से एक परम वैरागी, श्मशान वासी और सांसारिक मोह-माया से पूर्णतः विरक्त एक महान तपस्वी हैं, जिन्होंने अपनी प्रथम पत्नी सती के आत्मदाह के उपरांत स्वयं को घोर तपस्या और समाधि में लीन कर लिया था, परंतु जब तारकासुर नामक एक भयंकर असुर ने अपनी कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सकती है (यह सोचकर कि शिव तो कभी विवाह करेंगे ही नहीं), तब देवताओं की अत्यंत करुण प्रार्थना पर माता सती ने ही पर्वतराज हिमालय के घर माता पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया और शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए अन्न-जल त्यागकर हजारों वर्षों तक ऐसी घोर तपस्या की, जिसने अंततः शिव की गहरी समाधि को भी भंग कर दिया।

माता पार्वती की उस अनन्य भक्ति, अटूट प्रेम और निस्वार्थ तपस्या से अत्यंत प्रसन्न होकर भगवान शिव ने अंततः अपने वैराग्य को कुछ समय के लिए त्यागकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने का निर्णय लिया और जिस परम पावन रात्रि को वैराग्य के प्रतीक शिव और प्रकृति स्वरूपा माता पार्वती (शक्ति) का वह दिव्य, भव्य और अलौकिक विवाह संपन्न हुआ, जिसमें देवता, असुर, यक्ष, गंधर्व और भूत-पिशाच सभी बाराती बनकर शामिल हुए थे, वह रात्रि ब्रह्मांड के आध्यात्मिक इतिहास में महाशिवरात्रि के रूप में अमर हो गई, जो आज भी हमें यह महान संदेश देती है कि शिव (चेतना) और शक्ति (ऊर्जा) के पवित्र मिलन से ही इस संपूर्ण सृष्टि का सृजन और संचालन संभव है।

महाशिवरात्रि का महत्व (Importance of Mahashivratri)

महाशिवरात्रि का पावन पर्व भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि यह एक पारंपरिक त्योहार है, बल्कि इसका महत्व इसलिए भी सर्वोच्च है क्योंकि यह वह एकमात्र रात्रि है जब मानव चेतना, ब्रह्मांडीय ऊर्जा और ईश्वरीय शक्ति एक ऐसे दुर्लभ संयोग में आ मिलती हैं, जो किसी भी साधारण मनुष्य को उसके सीमित अस्तित्व से ऊपर उठाकर उसे असीम संभावनाओं और मोक्ष के द्वार तक ले जा सकती है।

1. आध्यात्मिक और योगिक महत्व: ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन (Natural Upsurge of Energy)

योग विज्ञान और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से महाशिवरात्रि वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण रात्रि मानी जाती है, क्योंकि खगोलीय गणनाओं के अनुसार, इस विशेष रात को पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में ग्रहों की स्थिति कुछ इस प्रकार बनती है कि मानव शरीर में प्राकृतिक रूप से ऊर्जा का प्रवाह गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध ऊपर की ओर (ऊर्ध्वगामी) होने लगता है। यही कारण है कि प्राचीन ऋषियों और योगियों ने इस रात्रि को सोने के बजाय ‘जागरण’ (रात भर जागने) का विधान बनाया है, ताकि रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर ध्यान करने से शरीर की सुप्त ‘कुंडलिनी शक्ति’ को सहस्रार चक्र तक पहुँचाने में प्रकृति स्वयं सहायता कर सके, जो अन्य किसी भी सामान्य रात्रि में संभव नहीं होता।

2. धार्मिक महत्व: शिव और शक्ति के संतुलन का उत्सव

धार्मिक मान्यताओं की गहराइयों में जाएं तो महाशिवरात्रि का महत्व इसलिए भी अद्वितीय है क्योंकि यह वह रात्रि है जब वैराग्य के प्रतीक भगवान शिव और सांसारिक शक्ति की प्रतीक माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था, जो यह संदेश देता है कि जीवन केवल त्याग और वैराग्य का नाम नहीं है और न ही केवल भोग और विलास का, बल्कि शिव और शक्ति का यह मिलन हमें सिखाता है कि एक सफल जीवन वही है जिसमें गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी मन से वैरागी रहा जाए और अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी ईश्वर से जुड़े रहा जाए।

3. ‘शिव’ तत्व का बोध: अंधकार से प्रकाश की ओर

शब्द ‘शिव’ का अर्थ है ‘वह जो नहीं है’ (That which is not) या ‘शून्य’, और महाशिवरात्रि का उत्सव वास्तव में अज्ञान, अहंकार और तामसिक गुणों (जैसे क्रोध, लोभ, मोह) के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश को भीतर जगाने का पर्व है। यह रात्रि हमें स्मरण कराती है कि जिस प्रकार भगवान शिव ने हलाहल विष को अपने कंठ में रोककर सृष्टि को बचाया था, उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन के नकारात्मक विचारों और बुराइयों को अपने मन के भीतर ही रोककर उन्हें समाप्त कर देना चाहिए, ताकि हम शिवत्व (शुद्ध चेतना) को प्राप्त कर सकें।

4. पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति

स्कंद पुराण और लिंग पुराण जैसे धर्मग्रंथों में महाशिवरात्रि के व्रत की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि यदि कोई मनुष्य अनजाने में भी इस दिन उपवास रखता है, शिवलिंग पर जल या बेलपत्र चढ़ाता है और रात्रि जागरण करता है, तो उसके जन्म-जन्मांतर के पाप उसी प्रकार भस्म हो जाते हैं जैसे अग्नि के संपर्क में आते ही रुई का ढेर जलकर राख हो जाता है। यह पर्व यह आश्वासन देता है कि भगवान भोलेनाथ केवल भाव के भूखे हैं और वे एक लोटा जल से भी इतने प्रसन्न हो जाते हैं कि अपने भक्त को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करके शिवलोक प्रदान कर देते हैं।

5. महिलाओं और दांपत्य जीवन के लिए महत्व

स्त्रियों के लिए महाशिवरात्रि का व्रत विशेष महत्व रखता है, क्योंकि कुंवारी कन्याएं सुयोग्य, शांत और शिव जैसे गुणवान पति की प्राप्ति के लिए पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं, जबकि सुहागिन स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु, स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य के लिए माता गौरी और भगवान शंकर की पूजा करती हैं, क्योंकि यह माना जाता है कि इसी दिन माता पार्वती की कठोर तपस्या सफल हुई थी और उन्हें अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त हुआ था।

यह भी पढ़ें  : Mahashivratir Puja Vidhi 2026 | भगवान शिव को प्रसन्न करने की संपूर्ण और शास्त्रोक्त प्रक्रिया

भगवान शिव को ‘महादेव’ क्यों कहा जाता है?

हिंदू धर्म में 33 कोटि देवी-देवता माने गए हैं, लेकिन भगवान शिव को ‘महादेव’ यानी ‘देवों के देव’ कहा जाता है क्योंकि वे त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में संहारक होते हुए भी सबसे भोले और शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं। उन्हें महादेव इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने न केवल देवताओं बल्कि असुरों, यक्षों, गंधर्वों और यहाँ तक कि भूतों-प्रेतों को भी अपनी शरण में लिया है, और वे किसी में भी भेदभाव नहीं करते। उनका निवास स्थान कैलाश पर्वत, उनका वेश (भस्म, बाघंबर, सर्प) और उनका जीवन दर्शन यह दर्शाता है कि वे भौतिक सुख-सुविधाओं से परे परम वैरागी हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी होकर भी एक तपस्वी की भांति रहते हैं, इसीलिए वे सर्वश्रेष्ठ देवता यानी ‘महादेव’ हैं।

महाशिवरात्रि 2026: शुभ मुहूर्त और तिथि

वर्ष 2026 में महाशिवरात्रि का पावन पर्व 15 फरवरी, 2026 (रविवार) को मनाया जाएगा।

  • चतुर्दशी तिथि का आरंभ: 15 फरवरी 2026 को शाम 05:04 बजे।
  • चतुर्दशी तिथि का समापन: 16 फरवरी 2026 को शाम 05:34 बजे।
  • निशिता काल (पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय): 15 फरवरी की मध्यरात्रि 12:09 बजे से लेकर 16 फरवरी की सुबह 01:01 बजे तक।
  • व्रत पारण का समय: 16 फरवरी 2026 को सुबह 06:59 बजे से दोपहर 03:24 बजे तक।

महाशिवरात्रि पूजा विधि

महाशिवरात्रि के पावन दिन पर सबसे पहले ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान-ध्यान से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लें और किसी शिव मंदिर में जाकर या घर पर ही शिवलिंग की पूजा आरंभ करें। सर्वप्रथम भगवान शिव को जल से स्नान कराएं और उसके बाद दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से अभिषेक करते हुए ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप निरंतर करते रहें।

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अभिषेक के पश्चात शिवलिंग को गंगाजल से धोकर चंदन या भस्म से त्रिपुंड लगाएं और उन्हें अत्यंत प्रिय बेलपत्र, धतूरा, भांग, मदार के पुष्प व अक्षत अर्पित करें। अंत में, धूप और घी का दीपक जलाकर मौसमी फलों या मिठाई का भोग लगाएं और सपरिवार कपूर से आरती उतारकर अपनी पूजा संपन्न करें व भूल-चूक के लिए क्षमा मांगें।

महाशिवरात्रि के मंत्र (Mahashivratri Mantra)

1. पंचाक्षर मंत्र (Shiva Panchakshara Mantra)

मंत्र: ॥ ॐ नमः शिवाय ॥

अर्थ और महत्व: यह भगवान शिव का सबसे मूल और शक्तिशाली बीज मंत्र है, जिसका निरंतर जाप करने से न केवल मन के समस्त विकार और पाप नष्ट हो जाते हैं, बल्कि यह साधक को जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करके मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। इस मंत्र के पांच अक्षर (न, म, शि, वा, य) पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो शरीर और ब्रह्मांड के बीच संतुलन स्थापित करते हैं।

2. महामृत्युंजय मंत्र (Mahamrityunjaya Mantra)

मंत्र: ॥ ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥

अर्थ और महत्व: ऋग्वेद में वर्णित यह मंत्र भगवान शिव को ‘मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाले’ (मृत्युंजय) के रूप में पूजता है, जिसका अर्थ है कि हम उस सुगंधित और पुष्टि प्रदान करने वाले तीन नेत्रों वाले भगवान (त्र्यंबक) की आराधना करते हैं, जो हमें अकाल मृत्यु, रोगों और सांसारिक बंधनों से उसी प्रकार मुक्त कर दें जैसे एक पका हुआ ककड़ी या खरबूजा अपनी बेल से सहज ही अलग हो जाता है।

3. शिव गायत्री मंत्र (Shiva Gayatri Mantra)

मंत्र: ॥ ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥

अर्थ और महत्व: यह मंत्र हमारी बुद्धि और चेतना को जागृत करने के लिए है, जिसमें हम प्रार्थना करते हैं कि हम उस महान पुरुष (तत्पुरुष) और देवों के देव महादेव को जानें और उनका ध्यान करें, ताकि वे (रुद्र) हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें और हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाएं।

4. कर्पूरगौरं मंत्र (Karpur Gauram Mantra)

मंत्र: ॥ कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि ॥

अर्थ और महत्व: आरती के समय गाया जाने वाला यह अत्यंत सुंदर श्लोक भगवान शिव के स्वरूप का वर्णन करता है, जिसका अर्थ है कि जो कपूर के समान गौर वर्ण वाले हैं, साक्षात करुणा के अवतार हैं, इस नश्वर संसार के एकमात्र सार हैं और जिन्होंने सर्पों के राजा (वासुकि) को हार के रूप में धारण किया हुआ है, वे भगवान शिव माता पार्वती सहित मेरे हृदय रूपी कमल में सदैव निवास करें।

🔱 Mahashivratri Gifts 🔱

शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में अंतर

अक्सर लोग शिवरात्रि और महाशिवरात्रि को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन इनमें एक बुनियादी अंतर यह है कि हिंदू पंचांग के अनुसार हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को ‘मासिक शिवरात्रि’ मनाई जाती है, जो वर्ष में 12 बार आती है। वहीं, ‘महाशिवरात्रि’ साल में केवल एक बार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है, जिसे सबसे बड़ी शिवरात्रि माना जाता है क्योंकि इसी दिन शिव-शक्ति का विवाह और लिंगोद्भव जैसी महान घटनाएं घटित हुई थीं।

भगवान शिव के अन्य नाम और उनके अर्थ

भगवान शिव के अनंत नाम हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख नाम और उनके अर्थ इस प्रकार हैं:

  • शंकर: सबका कल्याण करने वाले।
  • भोलेनाथ: जो अत्यंत सरल स्वभाव के हैं और बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं।
  • गंगाधर: जिन्होंने अपनी जटाओं में पवित्र गंगा नदी को धारण किया हुआ है।
  • पशुपतिनाथ: जो समस्त जीवों (पशुओं) के स्वामी और रक्षक हैं।
  • त्रिलोकेश: जो तीनों लोकों (आकाश, पाताल, पृथ्वी) के ईश्वर हैं।
  • नटराज: जो नृत्य कला के देवता और प्रवर्तक हैं।

निष्कर्ष:

महाशिवरात्रि हमें यह सिखाती है कि जीवन में विष (कठिनाइयों) को पीकर भी कैसे अमृत (आनंद) बांटा जा सकता है। इस दिन की गई पूजा और व्रत न केवल हमारी मनोकामनाओं को पूरा करते हैं, बल्कि हमें मोक्ष के मार्ग पर भी अग्रसर करते हैं।


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